मेरे बारे मे जितना कुछ मैं कह सकता हूं उस से ज्यादा और सही तो मुझसे जुड़े लोग ही कह पायेंगे…समझ नही पाता कि अपने बारे में क्या कहूं क्योंकि अपने आप को जानने समझने की प्रक्रिया जारी ही है…निरंतर फ़िर भी…जितना मैंने अपने-आप को जाना-समझा…
"बुरा जो देखण मैं चला,बुरा ना मिलया कोय,जो मन खोजा आपणा तो मुझसे बुरा ना कोय"
जितना विनम्र उतनी ही साफ़-कड़वी ज़ुबान भी…शांत पर ज़िद्दी,कभी-कभी अड़ियल होने के हद तक…अक्सर बातचीत के दौरान हल्की-फ़ुल्की बातें करके माहौल को हल्का बनाए रख्नना पसंद है।कभी-कभी ऐसा लगता है कि मैं समझदार हूं (ऐसी गलतफ़हमी अक्सर बार-बार हो जाती है)…वहीं कभी कभी दुसरी ओर ऐसा लगता है कि मैं अभी भी नासमझ हूं…दुनियादारी सीखने मे मुझे और भी समय लगेगा…(यह सोच एक मजाक लगे पर शायद यही सच है)।भीड़ मे रहकर भी भीड़ से अलग रहना मुझे पसंद है……कभी-कभी सोचता हूं कि मैं जुदा हुं दुसरों से,पर मेरे आसपास का ताना-बाना जल्द ही मुझे इस बात का एहसास करवा देता है कि नहीं, मैं दुसरों से भिन्न नहीं बल्कि उनमें से ही एक हूं…!"कर भला तो हो बुरा", जानें क्यों यह कहावत मुझ पर कुछ ज्यादा ही चरितार्थ होती है…करने जाता हूं किसी का भला,वापस लौटता हूं चार बातें सुनकर-अपनी बुराई लेकर…खैर…नेकी कर और दरिया में डाल…!कभी लगता है कि मेरे अन्दर गुस्सा नाम की चीज् ही नहीं…लेकिन कभी-कभी यह भी लगता है कि मुझे बहुत जल्दी गुस्सा आ जाता है…भावुक इतना कि भावनात्मक संवाद सुनकर या पढ़कर आँखें डब-डबा जाती है…पर दुसरे ही पल इतना क्रूर भी कि किसी के नाखून उखाड़ने में भी संकोच ना हो…भले ही रुपए-पैसे से धनी नहीं पर दोस्तों के मामले में जरुर धनी हूं…दोस्त ही यह एहसास करवाते हैं कि मैं उनके लिए भरोसेमंद हूं…, पर मैं निश्चित तौर से कह सकता हूं कि मैं भरोसेमंद नहीं…
स्वभाव में उत्सुकता कुछ ज्यादा ही साथ ही आसपास के घटनाक्रम से प्रभावित हुए बिना नही रह पाता था. काशी के ह्रदय स्थल अस्सी पर जन्म लेने के बाद से ही राजनीति और पत्रकारिता के धुरंधरों के सान्निध्य और कुछ और न कर पाने की परिणति से पत्रकारिता की ओर झुकाव हुआ सो तस्वीरों के माध्यम से दुनिया दिखाने का ठेका ले लिया और फोटो पत्रकार बना..... आजकल राष्ट्रीय अंग्रेज़ी दैनिक के लिए चंडीगढ़ मे कार्यरत हूँ ।
"शब्द और मैं"शब्दों का परिचय,जैसे आत्मपरिचय…मेरे शब्द!मात्र शब्द नही हूं,उनमें मैं स्वयं विराजता हूं,बसता हूंमैं ही अपना शब्द हूं,शब्द ही मैं हूं !निःसन्देह !मैं अपने शब्द का पर्याय हूं,मेरे शब्दों की सार्थकता पर लगा प्रश्नचिन्ह,मेरे अस्तित्व को नकारता है…मेरे अस्तित्व की तलाश,मानो अर्थ की ही खोज है॥इस सब के अलावा,बहुत से मौकों पर मैं इतना ज्यादा झुक जाता हुं कि लगे जैसे इस इंसान मे रीढ़ की हड्डी ही ना हो……पर मुझे लगताहै कि मुझमे वह सब कुट-कुट कर भरा हुआ है जिसे हम अंग्रेज़ी मे "ईगो" कह्ते हैं…लब्बो-लुआब यह कि मैं एक आम भारतीय हूं जिसकी योग्यता भी सिर्फ़ यही है कि वह एक आम भारतीय है जिसे यह नहीं मालुम कि आम से ख़ास बनने के लिए क्या किया जाए फ़िर भी वह आम से ख़ास बनने की कोशिश करता ही रहता है…।
धन्यवाद

1 comment:
maharaj bahot sunder kya bat hay maja aa gaya
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